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                                                   प्रमोद रिसालिया
 
                        हने की आवश्यकता ही नहीं कि नशा मानवीय व्यक्तित्व के लिए कितना घातक है। नशे के सेवन से अनेक प्रकार से मानसिक विकार पैदा होते है। इतना ही नहीं इसके इलावा नशे के सेवन से धर्म, अर्थ और काम का भी नाश होता है। हमारे सामने सवाल यह खड़ा होता है कि मनुष्य आखिर नशा करता क्यूं है? शराब, चरस, गांजा, अफीम तथा भांग का सेवन करके कुछ देर के लिए व्यक्ति सुख और आन्नद की अनुभूति करता है। मनुष्य आखिर बार-बार सुख और आन्नद की प्राप्ति के लिए बार-बार नशे का सेवन करता है। वास्तव में यही मनुष्य की आवृति उसकी आदत बन जाती हैं। मनुष्य नशे का सेवन करके एक दिन उसके पूर्ण वश में हो जाता हैं। व्यक्ति की यह परवशता असे नशेड़ी बना देती हैं। सीधी सी बात है कि नशेड़ी व्यक्ति नशा करने का बहाना ढुंढता है। यह अपनी इस आसुरी प्रवृत्ति से अपनी कुवृत्तियों पर पर्दा डालना चाहता है। यही कारण है कि वह त्यौहारो आदि पर जम कर नशा करता है। मद्यपान एक व्यापक प्रवृत्ति हैं। नशे के लिए अमीर-गरीब का कोई महत्व नहीं। सभी अपनी-अपनी आर्थिकस्थिति के अनुसार ही नशा करते है। गरीब वर्ग जहंा मामूली नशा करता है वहीं पर अमीर वर्ग उच्च श्रेणी के मादक पदार्थाे का सेवन करता है। अब नशा चाहे जो भी हो उच्च श्रेणी का हो या नीचे तबके का आखिर मानसिक और शारीरिक स्थिति तो एक जैसी ही होगी। नशे का सेवन अनेक प्रकार की सामाजिक बुराईयों को भी जन्म देता है। सामाजिक बुराई के पक्ष में महात्मा गांधी ने कहा है कि ‘‘शराब सब बुराईयों की जननी हैं। इसकी आदत राष्ट्र को विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर देगी।’’
             अब हमारे सामने सवाल यह उठता है कि नशाखोरी रोकी कैसे जाएं? किस प्रकार देश को नशा मुक्त बनाया जाएं? पुरातन काल से ही नशे के सेवन पर रोक के प्रयास होते चले आ रहे हैं। पुराणों में मद्यपान को बहुत बड़ा अनर्थकारी बताया गया है। आज सरकार द्वारा उठाए गए कदम कारगर साबित न हो सके। चाहे वो केन्द्रीय सरकार हो या फिर राज्य सरकार। सरकार नशे को चाह कर भी नहीं रोक सकती क्योंकि अगर सरकार ने ऐसा किया तो देश को उद्योगिक क्षेत्र में बड़ी हानि का सामना करना पड़ सकता है। ऐसा नहीं है कि सरकार ने नशे को रोकने का प्रयास नहीं किया। नशे को रोकने का प्रयास तो स्वतन्त्रता मिलने के उपरान्त ही शुरू हो गया था। केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों के तमाम नियमों के बाद भी शराब तथा अन्य नशों का सेवन जनमानस में पूर्णता के साथ फल-फूल रहा है। अब तो यह कहना भी गलत नही होगा कि मद्यपान गौरव और आधुनिकता का प्रतीक बन गया है। जहां मद्यपान को  कम होना चाहिए वहीं इसमें दिन-प्रतिदिन बढ़ोतरी हुई है। हरियाणा का प्रत्येक व्यक्ति जानता ही है कि शराबबन्दी के समय अपराध दर बढ़े थे। सरकार के इस काले कानून में (शराबीयों के लिए) राजस्व का नुक्सान होना ही था लेकिन शराबमाफियों ने शराबीयों के लिए शराब की कोई कमी नहीं छोड़ी। फलस्वरूप शराबबंदी के दुष्परिणामों को देख कर सरकार को इस कानून से मुंह की खानी पड़ी। मद्यपान की विसंगती और बुराई से प्रत्येक व्यक्ति परिचित है। फिर ऐसा क्यों ? प्रत्येक जागरूक व्यक्ति चाहता है देश इस बुराई से मुक्त हो फिर ऐसा क्यों ? फिर ऐसा क्यों ? यह सवाल हमारे सामनें तन कर आज भी खड़ा है। अगर हमारे देश को इस बुराई से मुक्ति पानी है तो सरकार को रास्जव-हानि और सत्ता हानि की चिंता किए बगैर कठोर-से-कठोर कदम उठाने होंगे। मादक पदार्थों के सारे स्त्रौतो को समाप्त करने का जी तोड़ प्रयास करना होगा। लोगों की अपनी मानसिकता में परिवर्तन करना होगा तभी लोग अंगूर की बेटी के अत्याचारों से निजात पा सकेंगे।
                     उसकी बेटी ने उठा रखी है, दुनिया सर पर,
                     खैरियत गुजरी कि ’’अंगूर‘‘ के बेटा न हुआ।

 
                                 प्रवीण व आयुष्मान

हीरे की सर्वाधिक खपत हालांकि अमेरिका में है, हीरा तराशने के कुल वैश्विक कारोबार में भारत का हिस्सा नब्बे फीसदी से अधिक है। गुजरात के काठियावाड़ी जैन समुदाय के लोग इस काम में माहिर हैं। गुजरात का सूरत और महाराष्ट्र में मुंबई इस उद्योग के सबसे बड़े केंद्र हैं। मुंबई से पधारे इंटरनेशनल जेमोलॉजिकल इंस्टीच्यूट के प्रतिनिधि और माणिकवेत्ता नीलाद्रि चक्रवर्ती ने हीरों के संबंध में बातचीत करते हुए इन तथ्यों का उल्लेख सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम हैलो सिरसा में किया। केंद्र निदेशक वीरेंद्र सिंह चौहान के साथ श्रोताओं से रूबरू हुए नीलाद्रि जेमोलॉजिकल इंस्टीच्यूट ऑफ अमेरिका से हीरों की परख के विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर चुके हैं। चक्रवर्ती ने कहा कि ऐसा नहीं हैं कि हीरे जड़ित आभूषण केवल धनी और रईस लोग ही पहन सकते हैं चूंकि हीरे के आभूषण पंद्रह हजार रुपये में भी मिल जाते हैं। चक्रवर्ती नहीं मानते कि विभिन्न प्रकार के माणिक धारण करने से किसी व्यक्ति के भाग्य या भविष्य पर कोई प्रभाव हो सकता है। पेश है इस वार्तालाप के संपादित अंश :


माणिक क्या होते हैं?
कोई भी गैर धातु वस्तु जो कि दुर्लभ हो और आभूषणों में प्रयोग हो उसे माणिक कहते है। हाथी के दाँत दुर्लभ है लेकिन धातु के नहीं होते इसलिए ये भी माणिक नहीं होते। माणिक अनेक प्रकार के होते हैं। कुछ माणिक मिनरल से बने होते है तो कुछ जीवाश्म से बने होते है, जैसे मोती, मूंगा आदि। विश्व में तीन सौ से भी अधिक किस्म के माणिक पाए जाते है। आमजन में हीरा, पन्ना, नीलम, मोती और लहसुनिया आदि प्रचलित है।

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                                   मुकेश जांगड़ा व पुष्पा रावत
गायकी में कामयाबी के लिए कतई आवश्यक नहीं कि लचर व द्विअर्थी गीतों का सहारा लिया जाए या फिर वीडियो एलबम में फूहड़ता भरे दृश्य परोसे ही जाएं। ऐसे छोटे-बड़े कलाकारों की संखया बहुत है जिन्होंने कभी गुणवत्ता के मामले में कोई समक्षौता नहीं किया। यह कहना है जानी-मानी पंजाबी लोक गायिका शमां लवली का। लेडी गुरदास मान और जट्टी पंजाब दी के खिताब से नवाजी जा चुकी शमां का कहना है कि उन्होंने कभी इस मामले में किसी लालच के सामने घुटने नहीं टेके। बकौल शमां कलाकार को अपनी कला पर भरोसा हो तो ही वह लचरता के खिलाफ अड़ कर खड़ा हो सकता है। शमां लवली चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय के सामुदायिक रेडियो स्टेशन पर हैलो सिरसा कार्यक्रम में केंद्र निदेशक वीरेंद्र सिंह चौहान से बातचीत कर रही थीं। शमां कहती है कि लचरता का इलाज काफी हद तक संगीत प्रेमियों के हाथ में भी है और वे हल्के स्तर के संगीत को खरीदना व सुनना बंद कर दें तो ऐसे संगीत को परोसने वाले स्वयं अपना रास्ता बदल लेंगे। उन्होंने गायकों का आवाहन किया कि वे गायकी में फूहड़ता के खिलाफ स्वयं भी खड़े हों। प्रस्तुत है इस बातचीत के संपादित अंशः

आपका गायन की ओर रुक्षान कैसे हुआ?
गायकी की कला खुदा की देन होती है। मुक्षे शुरू से ही गायन का शौक था और मैं स्कूल में सभी गायन प्रतियोगिताओं में भाग लेती थी। मैं हर प्रतियोगिता में जीत के निश्चय से भाग लेती थी। उस समय मैने एक राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में जीत हासिल की। उसके पश्चात मुक्षे उस समय के प्रसिद्ध कलाकारों के सम्मुख गाने का अवसर प्राप्त हुआ, जिससे मुक्षे प्रोत्साहन मिला। चूंकि मैं हाकी की अच्छी खिलाड़ी थी और मेरे पिता खेलों के दम पर मुक्षे आला पुलिस अधिकारी बनाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने मुक्षे संगीत की डगर पर बढ़ने से रोक दिया। संगीत के प्रति मेरी लगन और प्रतिभा को मेरे पति निशान सिंह राठौर ने बखूबी समक्षा और मुक्षे इस मामले में कुछ कर दिखाने का मौका दिया। मैं अभिभावकों से कहना चाहती हूं कि वे अपने बच्चों पर अपने सपने लादने के बजाय बच्चों की अपनी रुचि के क्षेत्र में कॅरियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करें।

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                     प्रवीण कुमार व आयुष्मान
मनोविज्ञान मानव के व्यवहार का अध्ययन है। यह किसी भी व्यक्ति के जीवन को अधिक सकारात्मक, आनंददायी और उपयोगी बनाने में खासा मददगार हो सकता है। यह एक भ्रांति ही है कि मनोवैज्ञानिक की मदद केवल पागल व्यक्ति के इलाज के लिए ही ला जाती है। यह कहना है जाने-माने मनोवैज्ञानिक और नेशनल कालेज में मनोविज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर रवींद्र पुरी का। सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम हैलो सिरसा में केंद्र निदेशक वीरेंद्र सिंह चैहान के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि मनोविज्ञान अब सार्थक व सकारात्मक जीवन जीने का विज्ञान बन चुका है। मनोवैज्ञानिक बगैर किसी औषधि के मनोदशा को दुरूस्त करने का मार्ग दिखाते हैं। यह मनोचिकित्सा से भिन्न है चूंकि मनोचिकित्सक दवाओं से मरीज की मदद करते हैं। पश्चिमी देशों में तो प्रत्येक विद्यालय में मनोवैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त होते हैं जो विद्यार्थियों का समय-सयम पर मार्गदर्शन करते रहते हैं। भारत में अभी यह प्रचलन नया है और चुनिंदा स्कूलों में ही ऐसे विशेषज्ञों की सेवाएं ली जा रही हैं। अभिभावकों को चाहिए कि वे स्कूल संचालकों पर मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों की सेवाएं लेने के लिए दबाव बनाएं। प्रस्तुत है इस वार्तालाप के संपादित अंश:-

मनोविज्ञान क्या है?
मनोविज्ञान का यह अर्थ कतई नहीं है कि कोई भी मनोवैज्ञानिक किसी भी व्यक्ति का चेहरा देख कर उसके बारे में बहुत कुछ बता सकता है। मनोविज्ञान भी एक विज्ञान है। मनुष्य के व्यवहार और उसके मानसिक कार्य की वैज्ञानिक जानकारी और उनके अध्ययन को ही मनोविज्ञान कहते हैं। प्राचीन दार्शनिक थेल्स ने साइके नामक शब्द को पहले आत्मा के लिए और फिर बाद में मन के लिए प्रयोग किया। इनके बाद 1490 के करीब एक दार्शनिक रूडोल्फ ने मनोवैज्ञानिक शब्द बनाया। लंबे समय तक इसे आत्मा के अध्ययन के रूप में जाना जाता रहा। कालांतर में यह अवधारण भी बदली। आज मनोविज्ञान को मानव के व्यवहार के अध्ययन के रूप में मान्यता है।

मनोविज्ञान में क्या बदलाव आए हैं?
प्राचीन समय में मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान माना जाता था। परन्तु जब वैज्ञानिकों ने शोध आरंभ किया तो वे आत्मा को देख नही पाए। विज्ञान कहती है कि जो प्रत्यक्ष दिखे उस को ही मानें। उसके बाद मनोविज्ञान को मन का और फिर चेतना का विज्ञान माना गया। लगभग सोलह सौ साल पहले वैज्ञानिकों और दार्शनिकों ने आपस में विचार करने के बाद मनोविज्ञान को मनुष्य के व्यवहार का विज्ञान माना।

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          प्रवीण इंसा व आयुष्मान
हमारे समाज में यह धारणा बनी हुई है कि दवाईयां शरीर को खराब करती है। इसलिए लोग समय पर दवाई नहीं लेते जिससे मरीज की स्थिति गंभीर हो जाती है। दूसरा कारण यह है कि झोला छाप डॉक्टरों के कारण भी लोगों का विश्वास समाप्त होता है। किसी भी रोगी की जांच हमेशा प्रशिक्षित चिकित्सक से ही करवाएं। कभी भी रोगी की जिंदगी से खिलवाड़ न करें। आज सामुदायिक रेडियो केन्द्र के कार्यक्रम हैलो सिरसा में केन्द्र निदेशक वीरेंद्र सिंह चौहान से मधुमेह व चर्म रोग पर बातचीत के दौरान डॉ. के.के बालिया ने उपरोक्त बातें कहीं। इस दौरान चर्म रोग व मधुमेह विशेषज्ञ डॉ. बालिया ने श्रोताओं की समस्याओं का निदान भी किया। पेश है बातचीत के मुख्य अंश-

मधुमेह क्या होता है?

वास्तव में यह मैटाबोलिक रोग है जिससे पैंकिर्या से इंसुलिन का निमार्ण कम हो जाता है। रक्त मे ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है। यदि कोई मरीज लगातार रोग से ग्रस्त रहता है तो उस पर दवाई का असर भी नहीं होता। रोग के पुनः उभारने की समस्या भी रहती है। मधुमेह दो प्रकार का होता है। जुरेनल मधुमेह बचपन में ही होता है। पैंकिर्या नाम मात्र के इंसुलिन पैदा करता है। तीस या पैंतीस वर्ष की आयु के बाद मधुमेह के होने से अभिप्राय यह है कि पैंकिर्या सुस्त हो गया है। इसे टाइप टू डायबिटीज भी कहते हैं।

क्या मधुमेह संक्रामक रोग है और इसके लक्षण क्या हैं?

यह संक्रामक रोग नहीं है। इसमें खानदानी कारक अहम् भूमिका निभाते है। अगर मां-बाप को मधुमेह है तो बच्चों को भी यह रोग हो सकता है। इससे बचने के लिए हमें सदा सचेत रहना चाहिए और परहेज पर भी ध्यान देना होगा। आज हमारी जीवन शैली बदल गयी है। जंक फूड की ओर अधिक ध्यान दिया जाता है। पौष्टिक तत्व भी बहुत लिए जाते हैं, परन्तु व्यायाम नहीं किया जाता, जिससे हमारा पाचन बिगड़ जाता है। आज सभी लोग आरामदायक जीवन जीना पसंद करते है। मधुमेह के मुख्य लक्षण यह है कि इसमें प्यास अधिक लगने लगती है, भूख भी अधिक लगती है। चालीस वर्ष की आयु के बाद निरंतर मधुमेह की जाँच करवाते रहना चाहिए।

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